किताब का शीर्षक " अंधी जनता, (भ्रष्ट) व्यवस्था" प्रस्तावना यह पुस्तक किसी नेता, अधिकारी या संस्था के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप नहीं है, बल्कि उस सोच, व्यवस्था और समाज की स्थिरता का सवाल है, जो धीरे-धीरे एक सामान्य व्यवहार को जन्म देती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लोकतंत्र की शक्ति है। यहां जनता ही असली मालिक है, और नेता और अधिकारी उसका नौकर है। लेकिन समय के साथ-साथ यह संतुलन बिगड़ गया। नौकर मालिक बन गया और मालिक यानी जनता गायब हो गई। आज के हालात ऐसे दिखते हैं कि कई नेता जनता की सेवा के बजाय निजी नौकरों में लगे रहते हैं, कुछ अधिकारियों का कहना है कि, और आम जनता इन सब को देखकर भी चुप रहती है। यह शैली ही सबसे बड़ी समस्या है। जब अन्याय को सहना आदत बन जाए, जब गलत को देखकर भी आवाज न उठ जाए, जब अपराध को "काम करने का तरीका" मान जाए- तब समाज धीरे-धीरे अपनी नैतिक शक्ति खो देता है। यह पुस्तक मौन टूर पर मौजूद है। यह प्रश्न उठाती है— क्या सच में सभी नेता घटिया हैं? जनता सच में आँधी, बाहरी और गाँव का क्या मतलब है? या फिर व्यवस्था ने लोगों को ऐसा ब...
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