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“अंधी जनता, भ्रष्ट व्यवस्था”

 

किताब का शीर्षक

" अंधी जनता, (भ्रष्ट) व्यवस्था"

प्रस्तावना

यह पुस्तक किसी नेता, अधिकारी या संस्था के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप नहीं है, बल्कि उस सोच, व्यवस्था और समाज की स्थिरता का सवाल है, जो धीरे-धीरे एक सामान्य व्यवहार को जन्म देती है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लोकतंत्र की शक्ति है। यहां जनता ही असली मालिक है, और नेता और अधिकारी उसका नौकर है। लेकिन समय के साथ-साथ यह संतुलन बिगड़ गया। नौकर मालिक बन गया और मालिक यानी जनता गायब हो गई।

आज के हालात ऐसे दिखते हैं कि

  • कई नेता जनता की सेवा के बजाय निजी नौकरों में लगे रहते हैं,
  • कुछ अधिकारियों का कहना है कि,
  • और आम जनता इन सब को देखकर भी चुप रहती है।

यह शैली ही सबसे बड़ी समस्या है।
जब अन्याय को सहना आदत बन जाए,
जब गलत को देखकर भी आवाज न उठ जाए,
जब अपराध को "काम करने का तरीका" मान जाए-
तब समाज धीरे-धीरे अपनी नैतिक शक्ति खो देता है।

यह पुस्तक मौन टूर पर मौजूद है।
यह प्रश्न उठाती है—

  • क्या सच में सभी नेता घटिया हैं?
  • जनता सच में आँधी, बाहरी और गाँव का क्या मतलब है?
  • या फिर व्यवस्था ने लोगों को ऐसा बनाया?

इस पुस्तक का उद्देश्य घृणा फैलाना नहीं, बल्कि तिरस्कार करना है।
यह यूएन संप्रदाय को देखने का प्रयास है जिसमें राष्ट्रीय क्रीड़ा को बढ़ावा दिया गया है,
फिर यूएन संप्रदाय को देखने के प्रयास से आयन जनता का मौन हो गया है,
और उन शान की खोज को राष्ट्रीय समाज से जगाया जा सकता है।

अगर जनता जगेगी
तो सबसे मजबूत कुर्सी भी हिल सकती है।
लेकिन अगर जनता ही सोई रही
तो प्राचीनतम तक की सबसे खराब व्यवस्था भी चलती रहती है।

यह किताब एक आईना है—
व्यवस्था के लिए भी,
और जनता के लिए भी।
क्योंकि परिवर्तन हमेशा प्रश्न से शुरू होता है,
और प्रश्न लोकतंत्र की असली ताकत है।


लेखक = पवन यादव ✍️✍️


लोकतंत्र, अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक (नागरिकों की खोज)

✍️ भाग 1 : समस्या की जड़ (अध्याय 1-10)

अध्याय 1 - लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ

लोकतंत्र क्या है? जनता की शक्ति क्या है? संविधान की मूल भावना।

अध्याय 2 – सत्ता का चरित्र

सत्य क्यों बदल जाता है इंसान को? सिद्धांत और शक्ति का प्रभाव।

अध्याय 3 - मास्टर की परिभाषा

बंधक केवल बंधक नहीं - नैतिक, सामाजिक और मानसिक।

अध्याय 4 - ऐतिहासिक रूप से विनाशकारी शासन

ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर आधुनिक राजनीति तक सत्य के आदर्श का उदाहरण।

अध्याय 5 - आज का राजनीतिक ढाँचा

दल, चुनाव, दार्जिलिंग, अध्यात्म की भूमिका।

अध्याय 6 - अधिकारी तंत्र और सिस्टम

ब्यूरोसीक्रेसी की भूमिका - समस्या या समाधान?

अध्याय 7 – जनता की शैलियाँ

लोग आवाज क्यों नहीं अक्षर? डॉक्टर, लंदन या स्कोडा?

अध्याय 8 - "सब ऐसे ही रहते हैं" आदर्श

सामाजिक संयोजन कैसे मजबूत होता है।

अध्याय 9 - शिक्षा एवं नैतिक पतन

शिक्षा व्यवस्था में चरित्र निर्माण की कमी।

अध्याय 10 - मीडिया और सच्चाई

मीडिया चतुर्थ स्तम्भ क्या व्यवसाय है?

✍️ भाग 2 : जनता क्यों अंधी, बाहरी और गाय? (अध्याय 11-20)

अध्याय 11 - राजनीति की राजनीति

सत्य भय कैसे उत्पन्न होता है।

अध्याय 12 - मुफ़्त की राजनीति

लाभ योजनाएँ और वोट बैंक।

अध्याय 13 - जाति और धर्म का खेल

समाज को बांटकर शासन करना।

अध्याय 14 – धर्म और सत्ता

धर्म का राजनीतिक उपयोग।

अध्याय 15 - सोशल मीडिया का भ्रम

ज्ञान का युग या ब्रह्माण्ड का युग?

अध्याय 16 - भीड़ की पहेली

भीड़ में सोच क्यों खत्म हो गई?

अध्याय 17 - कानून का डा

कानूनी लड़ाई का नमूना और आम आदमी।

अध्याय 18 - आर्थिक मजबूरी

गरीबी और मजबूरी का रिश्ता।

अध्याय 19 - युवा और डिज़ाइन

युवाओं की राजनीति से दूर रहें।

अध्याय 20 - वोट की ताकत और अनदेखी

मतदान सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी।

✍️ भाग 3 : सिस्टम मजबूत होता है? (अध्याय 21-30)

अध्याय 21 - लागत और काला धन

चुनाव में धन का असर।

अध्याय 22 - पुलिस एवं प्रशासन

कानून लागू करने वालों की स्थिति।

अध्याय 23 - नैतिक शिक्षा की भूमिका

न्याय बैठक में विवरण और उसका प्रभाव।

अध्याय 24 - सरकारी योजनाएँ

नीति और ज़मीन की कहानी।

अध्याय 25 - अभिनेता और उनकी राजनीति

बड़े घोटालों से जनता क्या सीखती है?

अध्याय 26 - मूर्ति और शक्ति गठजोड़

व्यवसाय और राजनीति का संबंध।

अध्याय 27 - पोस्टिंग-पोस्टिंग उद्योग

खरीद-फरोख्त की खरीद-फरोख्त।

अध्याय 28 - स्थानीय पर्यटन का सच

ग्राम पंचायत से नगर निगम तक।

अध्याय 29 - आम नागरिक का नुकसान

सिस्टम से ड्राइवर थक गया।

अध्याय 30 - ईमानदार अधिकारी और नेता

सभी आदर्श नहीं - कुछ अपवादों की प्रेरणादायक कहानियाँ।

✍️ भाग 4 : समाधान और समाधान (अध्याय 31-40)

अध्याय 31 – वैज्ञानिक नागरिक कौन?

सक्रिय नागरिकता की परिभाषा।

अध्याय 32 - सूचना का अधिकार

सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की शक्ति।

अध्याय 33 - जन आंदोलन की ताकत

अन्ना हज़ारे और समाजवादी आंदोलनकारी।

अध्याय 34 – संविधान की शपथ

भारतीय संविधान के मूल अधिकार और कर्तव्य।

अध्याय 35 - शिक्षा में सुधार

नैतिक शिक्षा की वापसी।

अध्याय 36 - डिजिटल प्लॉट

ई-अवसर और प्रौद्योगिकी की भूमिका।

अध्याय 37 - युवा नेतृत्व

नई पीढ़ी और राजनीति में प्रवेश।

अध्याय 38 - स्थानीय स्तर से परिवर्तन

ग्राम सभा और महोत्सव की शक्ति।

अध्याय 39 - व्यक्तिगत विवरण

बदलाव घर से शुरू होता है।

अध्याय 40 – नई सुबह की संभावना

अगर जनता जागे तो भारत कैसा होगा?



भाग 1 : समस्या की जड़

अध्याय 1 - लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ

लोकतंत्र शब्द रिकार्ड ही हमारे मन में एक ऐसी व्यवस्था की तस्वीर उभरती है जहां जनता सर्वोच्च है। जहां सरकार जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता की होती है। लेकिन यह सिर्फ एक आदर्श परिभाषा है। वास्तविकता में लोकतंत्र कैसा दिखता है, यह पूरी तरह से देश की जनता की सोच, जागरूकता और अधिकार पर प्रतिबंध लगाता है।

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यहां लाखों लोग हर पांच साल में वोट देते हैं, सरकार को वोट देते हैं और उम्मीद करते हैं कि सरकार अपना जीवन बेहतर बनाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ वोट ही लोकतंत्र है?

लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है।

लोकतंत्र एक सोच है, एक संस्कृति है, एक जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र की बुनियाद

लोकतंत्र की मूल शक्ति संविधान और जनता की जागरूकता में है। संविधान देश का वर्णन करता है कि जनता को अधिकार देता है और सरकार अधिकार देती है। यदि नागरिक अपनी शक्तियों को जानते हैं और उनका सही उपयोग करते हैं, तो लोकतंत्र मजबूत बनता है।

भारतीय संविधान में हर नागरिक को स्वतंत्रता की स्वतंत्रता, स्वतंत्रता की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। यह सिर्फ साहित्य में लिखित शब्द नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा हैं।

लेकिन जब नागरिक अपनी शक्तियों को भूल जाते हैं, या उन्हें संकेत देने की कोशिश नहीं करते हैं, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे गिरता हुआ प्रतीत होता है।

जनता का मालिक, नेता सेवक

लोकतंत्र में असली मालिक जनता होती है। नेता और अधिकारी जनता के सेवक होते हैं। उन्हें जनता के पैसे से वेतन मिलता है, जनता के वोट से वोट मिलता है, जनता और वोट से सम्मान मिलता है।

लेकिन समय के साथ यह बिंदु स्थिति दिखाई देती है।

नौकर मालिक व्यवहार करते हैं,

और मालिक जनता, डरने लगती है।

जब जनता अपने द्वारा चुने गए वोट से डरने लगे,

तो फिर लोकतंत्र बंद हो रहा है।

वोट की ताकत

एक आम आदमी के पास लोकतंत्र में सबसे बड़ा हथियार उसका वोट होता है। यह एक छोटी सी सोसायटी की लाइन नहीं है, बल्कि सत्ता परिवर्तन की ताकत है।

इतिहास गवाह है कि जब जनता जागती है, तो सबसे मजबूत सरकार भी बदल जाती है। लेकिन जब जनता इतनी होती है तो सबसे गरीब और घटिया सरकार बन जाती है।

समस्या यह है कि बहुत से लोग वोट चयन से नहीं लेते।

कोई भी यात्री लेने वाला वोट देता है,

कोई भी जाति देखकर वोट देता है,

कोई धर्म देखकर वोट देता है,

और कोई नोट नहीं नोट।

इससे लोकतंत्र की आत्मा देर से मिलती है।

लोकतंत्र सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है

बहुत से लोग लोकतंत्र को विशेष अधिकार से प्राप्त करते हैं।

उन्हें लगता है कि

सरकारी नौकरी दे,

सरकारी सुविधा दे,

सरकार सब कुछ ठीक करे।

लेकिन वे अपने लेबल को भूल जाते हैं।

लोकतंत्र में नागरिकों की जिम्मेदारियाँ भी होती हैं:

सही नेता

कानून का पालन करना

गरीबों का विरोध करना

सामाजिक व्यवसाय बनायें

यदि जनता अपने नियम तोड़े, रिश्वत दे, गलत कर्मचारियों को स्वीकार करे, तो फिर नेताओं से सिद्धांत की दृढ़ता का पालन करना असम्भव बन जाता है।

लोकतंत्र की असली बीमारी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी बीमारी जापानी नेता नहीं, बल्कि मौन जनता है।

कट्टरपंथी नेता वैसे ही पैदा होते हैं, जब जनता उन्हें चुनती है या उनकी पार्टी पर चुप रहती है।

अगर जनता सच में सलाहकार हो जाए, तो:

ग़लत नेता चुनाव नहीं जीत सकते

अधिकारी रिश्वत लेने से डरेंगे

और सिस्टम धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे लोगों को खोखला कर देगा, एक दीमक की तरह।

लेकिन अगर जनता ही अंधी है, बाहरी और गांव वाली है, और सरकारी नौकरियाँ बना रही है, तो कोई संविधान, कोई कानून, कोई संस्था नहीं बच सकती।

असली लोकतंत्र कैसा होता है?

असली लोकतंत्र कहाँ होता है:

जनता प्रश्नोत्तरी है

नेता देते हैं जवाब

कानून सब पर एक समान रूप से लागू होता है।

और लोकतांत्रिक राजनीति से बड़ी होती है।

लोकतंत्र सिर्फ संसद या विधानसभा में नहीं होता।

वह स्ट्रीट, स्ट्रीट, स्कूल, अपार्टमेंट और घर में भी होता है।

जहां लोग सच बोलने वाले से मठवासी हैं,

जहां गलत को देखकर भी चुप रहते हैं,

वहां लोकतंत्र सिर्फ कागज़ पर रहता है।

उत्साह

डेमोक्रेसी की कोई मशीन नहीं है, जो आप अपनी मशीन चला रहे हैं।

यह एक जीवित व्यवस्था है, जिसमें जनता की जागरूकता, अभ्यास और साहस की आवश्यकता है।

अगर जनता मजबूत होगी,

तो लोकतंत्र मजबूत होगा।

अगर जनता दल,

तो लोकतंत्र नाम सिर्फ का रहेगा।

इस पुस्तक की यात्रा की झलक से शुरू होती है—

एक सवाल से:

क्या समस्या सिर्फ नेताओं में है,

या जनता भी इस व्यवस्था का हिस्सा है?



अध्याय 2 – सत्ता का चरित्र

सत्य एक अदृश्य नशा है।

यह शराब की तरह शरीर को नहीं, बल्कि मन को प्रभावित करती है।

सत्य मिलते ही मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। पहले जो पर्सनल प्रपोजल था, उसने ऐसा करने का ऑर्डर दिया था। जिस जनता के बीच में दरार पड़ गई थी, वह सुरक्षा के वादे पर खरा उतरा है।

प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता क्यों समाप्त हो गई, बल्कि प्रश्न यह है कि सत्ता व्यक्ति का वास्तविक चरित्र सामने क्यों आया?

सिद्धांत यह है कि जब किसी व्यक्ति के पास अधिकार होता है और उसका मूल्यांकन कम होता है, तो उसका व्यवहार धीरे-धीरे निरंकुश हो सकता है। सत्य यदि सीमित और नियंत्रित नहीं है, तो वह व्यवहारकर्ता को जन्म देता है।

लोकतंत्र में सत्ता सत्ता है।

लेकिन जब नेता सत्ता पर स्थिर रुख अपनाते हैं, तो लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है।

शक्ति का संतुलन तीन स्तंभों पर दिखता है—

विधायिका, कार्यपालिका और पर्यवेक्षक।

यदि आपका संतुलन संतुलित हो गया है, तो शक्ति का संतुलन शुरू हो जाता है।

सत्य बुरा नहीं होता,

लेकिन अविश्वसनीय सत्य हमेशा खतरनाक होता है।

अध्याय 3 - मास्टर की परिभाषा

उधार लेना का मतलब सिर्फ उधार लेना नहीं है।

कब्ज़ा तब भी होता है जब:

किसी विशेष व्यक्ति को नौकरी न नौकरी वाले को दिया जाये

सरकारी योजना का लाभ मूल पत्रिका उत्तर प्रदेश तक

कानून को लाभ के लिए लाभ मिलता है

अर्थशास्त्री भी है, नैतिक भी है और मानसिक भी है।

नैतिक ढांचा तब शुरू होता है जब समाज को गलत माना जाता है।

जब लोग कहते हैं - "थोड़ा बहुत तो रहता है" - तब जड़वत झीलें होती हैं।

वह ख़तरनाक निर्माता है जो इसमें दिखाई नहीं देता है।

जैसे—

वोट।

जाति या धर्म के नाम पर भड़काना।

वादा करना।

सिर्फ नेताओं का नहीं होता.

जब नागरिक स्वयं सेवकों को तोड़ते हैं, टैक्स चोरी करते हैं, या गलत काम के लिए रिश्वत देते हैं, तब वे भी उसी चक्र का हिस्सा बन जाते हैं।

अध्याय 4 - ऐतिहासिक रूप से विनाशकारी शासन

इतिहास बताता है कि जब भी सत्य निरंकुश हुआ, समाज बन गया।

भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के नाम पर शासन किया।

सत्ता और लाभ के लालच ने किया जनता का शोषण।

यह सिर्फ विदेशी शासन की कहानी नहीं है।

दुनिया के कई देशों में सत्य का रहस्य है।

जब एकजुटता नहीं होती,

जब संस्थाएँ स्वतंत्र नहीं रहतीं,

तब शासन-प्रशासन हो गया है।

इतिहास हमें चेतावनी देता है—

अगर नागरिक रुकना नहीं हैं, तो धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-दारा-दारा-दारा-चाहे-दारा-दारा-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरा-आधार दिया जा सकता है। ..

अध्याय 5 - आज का राजनीतिक ढाँचा

आज राजनीति गठबंधन से मुख्य प्रबंधन गठबंधन जारी है।

चुनाव अभियान, रणनीति, सोशल मीडिया प्रचार- सब कुछ योजना से होता है।

राजनीतिक दल जनता के बहुमत से लेकर समाजवादी समतावादी की रणनीति पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

धनबल और बाहुबली का प्रभाव लोकतंत्र की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

जब-जब बाजार बिकता है, तब-तब राजनीति में प्रवेश भी महंगा हो जाता है।

इससे आम और ईमानदार व्यक्ति के लिए राजनीति में जगह बनाना कठिन हो जाता है।

अध्याय 6 - अधिकारी तंत्र और सिस्टम

सरकारी अधिकारी व्यवस्था की व्यवस्थाएँ होती हैं।

वे नीति को जमीन पर लागू करते हैं।

लेकिन जब अधिकारी तंत्र में प्लास्टिक और ग्लास की कमी होती है, तो प्लास्टर पाठे लगता है।

कुछ अधिकारी ईमानदार हैं और दबाव के बावजूद सही काम कर रहे हैं।

लेकिन सिस्टम का ढांचा यदि कॉम्प्लेक्स और अपारदर्शी हो, तो गलत तत्व मजबूत हो जाते हैं।

समस्या व्यक्ति से लेकर आर्किटेक्चरल संरचना में भी हो सकता है।

अध्याय 7 – जनता की शैलियाँ

सबसे बड़ा सवाल—जनता चिप्स क्यों रहती है?

डर?

समय की कमी?

या ये विश्वास है कि “कुछ बदलाव वाला नहीं”?

जब नागरिक भर्ती पद से कतराते हैं,

जब अन्याय देखकर भी आगे न बढ़ें,

मूर्तिपूजक लोगों की शानदार हुई संख्या।

लोकतंत्र में मौन भी एक राजनीतिक क्रिया है।

चॉकलेट चॉकलेट बारम्बार व्यवस्था के पक्ष में जाना जाता है।

अध्याय 8 - "सब ऐसे ही रहते हैं" आदर्श

यह वाक्य समाज के नैतिक पतन का प्रतीक है।

“यहाँ ऐसा ही होता है।”

“बिना पैसे काम नहीं होता।”

जब समाज गलत हो जाता है तो सुधार की आशा कम हो जाती है।

परिणाम सबसे कठिन काम है,

लेकिन सुधार की शुरुआत कहीं से भी होती है।

अध्याय 9 - शिक्षा एवं नैतिक पतन

शिक्षा केवल फ्लोरिडा के माध्यम से डिग्री प्रदान की जा रही है।

चरित्र निर्माण, नागरिक जिम्मेदारी और नैतिक शिक्षा पीछे छूटती जा रही है।

अगर स्कूल और कॉलेज के युवाओं को सिर्फ नौकरी की तैयारी करनी है,

लेकिन उन्हें जिम्मेदार नागरिक न छोड़ें,

तो लोकतंत्र फ्रैंचाइज़ी होगी।

शिक्षा व्यवस्था को व्यवसाय से जोड़ना आवश्यक है।

अध्याय 10 - मीडिया और सच्चाई

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।

उसका काम है—सत्ता से प्रश्न पूछना।

लेकिन जब-जब मीडिया पर आर्थिक या राजनीतिक दबाव बढ़ा है,

तो प्रभावित हो सकता है.

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को सबसे आसान बनाया है,

लेकिन गलत सूचना का प्रसार भी तेजी से हुआ है।

जनता को जानकारी है,

लेकिन सत्य को पहचानना कठिन हो रहा है।

भाग 1 का समापन विचार

समस्या बहुशास्त्रीय है।

सत्ता, व्यवस्था, राजनीति, मीडिया और जनता सब जुड़े हुए हैं।

यदि समस्या जटिल है,

तो समाधान भी सामूहिक होगा।






भा ग 2 : जनता अंधी, बाहरी और ग का उद्देश्य क्यों है ?




अध्याय 11 से 20 के विस्तृत चित्र

अध्याय 11 - डर की राजनीति

डॉ. शासन का सबसे पुराना हथियार है।

इतिहास में कई शासकों ने तलवारों से नहीं, बल्कि भय से शासन किया है।

जब जनता डरती है, तो सवाल नहीं पूछती।

जब प्रश्न नहीं होता, तो लघुता समाप्त हो जाती है।

डॉ में कई वैज्ञानिक विवरण मौजूद हैं:

शौक़ का डर,

केस का डर,

नौकरी जाने का डर,

सामाजिक बहिष्कार के डर,

जब जनरल ने कहा कि "सिस्टम बेकार है", तब विरोध के बिना सत्य स्थिर है।

डॉक्टर का इलाज सिर्फ एक चीज है-संगठन और जागरूकता।

अकेला व्यक्ति डरता है, लेकिन समन्वित समाज मजबूत होता है।

अध्याय 12 - मुफ़्त की राजनीति

राजनीति में मुफ़्त की योजना नई बात नहीं हैं।

गरीबों की मदद करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन जब सहायता और लालच के बीच की रेखा बनती है, तब लोकतंत्र प्रभावित होता है।

जब वोट के बदले में:

पैसा

शराब

उपहार

या अंतिम ढांचा ,

जाते हैं, तो सिद्धांत सिद्धांत से हटकर दिलबाज़ी बन जाते हैं।

मुफ़्त की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि वे एक नागरिक के रूप में नशा करने का अधिकार रखते हैं।

अध्याय 13 - जाति और धर्म का खेल

भारत विविधताओं का देश है।

हमारी सेना में यह विविधता हो सकती है, लेकिन राजनीति में अक्सर इसे हथियार बना दिया जाता है।

जब चुनाव नामांकन पर नहीं, पहचान पर वोट मिलते हैं,

तो विकास पीछे छूट जाता है।

जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगना आसान होता है,

क्योंकि इससे भावनाएँ जुड़ी होती हैं।

लेकिन इसका परिणाम समाज में फूट और अविश्वास के रूप में सामने आता है। (हिन्दू, मुस्लिम ईसाई)

अध्याय 14 – धर्म और सत्ता

धर्म का मूल उद्देश्य मानवीय, संविधान और आंतरिक शांति है।

लेकिन जब धर्म का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए होता है, तो उसका स्वरूप बदल जाता है।

धार्मिक भावनाएँ बहुत शक्तिशाली होती हैं।

जब भी भड़काया जाता है, तो लोग तर्क से अधिक भावना से निर्णय ले लेते हैं।

धर्म का राजनीतिक उपयोग संप्रदाय समाज को दो संप्रदायों में बाँट देता है—

"हम" और "वे

ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का आधार—समता और न्याय—कमज़ोर हो जाता है।

अध्याय 15 - सोशल मीडिया का भ्रम

सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात देखने का मंच दिया है।

अब हर नागरिक एक तरह से "मीडिया" बन गया है।

लेकिन इसके साथ एक समस्या यह भी है- चटपटी ख़बरों का प्रकाशन।

आज कई लोग सच्चाई से अधिक तुलनीय जानकारी पर भरोसा करने लगे हैं।

फ़र्ज़ी वीडियो, झूठ और झूठ आँकड़े वाली तस्वीरें समाज में भ्रम फैलाते हैं।

जब नागरिक सूचना पर आधारित निर्णय लिये जाते हैं,

तो लोकतंत्र की दिशा भी गलत हो सकती है।

अध्याय 16 - भीड़ की पहेली

भीड़ में व्यक्ति की पहचान आदर्श होती है।

वह अपनी व्यक्तिगत सोच के बजाय समूह की भावना से लेकर खोज की कल्पना करता है।

भीड़ में:

जिम्मेदारी कम महसूस होती है।

तर्क कम हो जाता है

भावनाएँ प्रबल हो जाती हैं

इसी कारण कई बार लोग काम नहीं करते, जो अकेले में कभी काम नहीं करते।

राजनीति में भीड़ द्वारा ताकतों का इस्तेमाल किया जाता है।

लेकिन भीड़ हमेशा वैयक्तिक नागरिकों का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

अध्याय 17 - कानून का डर,

कानून का उद्देश्य जनता की रक्षा करना है।

लेकिन जब कानून जटिल और धीमा हो जाता है, तो आम आदमी ही डरने लगता है।

खर्च पैसे होते हैं।

समय नष्ट हो जाता है।

जुड़े हुए लोग दिखा रहे हैं—

“लड़ने से अच्छा है एग्रीमेंट कर लो।”

यह साज़िश, साज़िश को बढ़ावा देता है, क्योंकि गलत लोगों को पता है कि लोग कोर्ट-कचहरी से बचना चाहते हैं।

अध्याय 18 - आर्थिक मजबूरी

गरीबी और मजबूरी का गहरा रिश्ता है।

जब किसी के पास:

स्थिर आय नहीं होती,

नौकरी का भरोसा नहीं होता,

भविष्य की सुरक्षा नहीं होती..

तो वह कभी-कभी गैर सरकारी प्रवेश से कर्ज़ लेने के लिए मजबूर हो जाती है।

इसी प्रकार, गरीब नागरिक अपराध के खिलाफ लड़ाई की स्थिति में नहीं है।

उनके लिए रोज़ की रोटी सबसे तेज़ है।

इकोनोमिक डेमोक्रेसी को फ़्रॉफ़ बनाया गया है, क्योंकि फ़्रॉफ़ स्क्वायर का एक गाना बनाया गया है।

अध्याय 19 - युवा और डिज़ाइन

युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकतें होती हैं।

लेकिन जब युवा राजनीति दूर हो जाती है, तो व्यवस्था सोच हाथों में रह जाती है।

आज कई युवा राजनीति को प्रिय क्षेत्र माना जाता है।

वे कहते हैं- "हम इस सब में नहीं पढ़ना चाहते।"

लेकिन जब अच्छे लोग राजनीति से दूर रहे,

तो खाली जगह गलत लोग भर देते हैं।

लोकतंत्र को स्वस्थ बनाने के लिए युवाओं की भागीदारी जरूरी है।

अध्याय 20 - वोट की ताकत और अनदेखी

वोट लोकतंत्र का सबसे शक्तिशाली हथियार है।

लेकिन इस हथियार का प्रयोग बार-बार नहीं होता।

कई लोग :

वोट न दें।

या बिना सोचे समझे वोट देते हैं।

कुछ लोग चुनाव को छुट्टी का दिन मानते हैं।

लेकिन जिस देश का भविष्य तय होता है।

जब वैज्ञानिक लोग वोट नहीं देते,

तो निर्णय कम सलाहकार लोगों के हाथ में चला जाता है।

लोकतंत्र में अव्यवस्थित सरकार से अधिक ख़तरनाक है—

राष्ट्रीय नागरिक।

भाग 2 का समापन विचार।

जनता का उद्देश्य, बाहरी और अंधी, जन्म से नहीं होता।

बल्कि,उसे परिस्थितियाँ ऐसी परिस्थितियाँ में खड़ी कर देती हैं—कि वो खुद, इसमें फँस जाती है। जैसे ये+++

दरिद्रता, गरीबी, भ्रम, विभाजन और विभाजन।

लेकिन यही जनता जब जागती है,

तो इतिहास बदल जाता है।






भाग 3 : सिस्टम कितना मजबूत होता है?

( अध्याय 21-30) विस्तृत लेख


अध्याय 21 - लागत और काला धन

लोकतंत्र का उत्सव कहा जाता है।

लेकिन जब चुनाव में अमीर अमीर हो जाते हैं, तो यह उत्सव धीरे-धीरे निवेश (निवेश) में बदल जाता है।

पोस्टर, रेलियाँ, प्रचार, सोशल मीडिया अभियान- सब पर भारी खर्च होता है।

जब कोई आम आदमी पैसा खर्च करता है तो उसका स्वभाव प्रश्न होता है- यह पैसा कहाँ से आता है?

जापानी ख़र्च में एप्लायंस की कमी प्रणाली ख़राब हो गई है।

यदि राजनीति में प्रवेश महंगा हो जाए, तो सामान्य और ईमानदार नागरिक के लिए लगभग बंद हो जाता है।

जहां चुनाव महंगा है, वहां 

 राजनीति धीरे-धीरे- सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बिजनेस बन जाती है।


अध्याय 22 - पुलिस एवं प्रशासन

पुलिस और प्रशासन कानून लागू करने वाली संस्थाएँ हैं।

इसका उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना है।

लेकिन जब भी इन पर राजनीतिक दबाव आता है, तो लालची कुछ भी सही नहीं किया जाता है, गलत कर दिया जाता है और ये पुलिस प्रशासन भी बेकार हो जाता है 

तो प्रभावित हो ही जाता है..

ईमानदार अधिकारी भी कई बार सचिवालय, दबाव या अपवित्रता का सामना करते हैं।

जब सिस्टम में स्थिरता और स्वतंत्रता नहीं होती,

तो गलत तत्व मजबूत हो जाते हैं।

पुलिस प्रशासन और मजबूत रहेंगे तो लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

लेकिन अगर वे राजनीतिक प्रभाव में काम करें,

तो जनता का पसंदीदा खिलाड़ी लगता है.


अध्याय 23 - नैतिक शिक्षा की भूमिका

लोकतंत्र का अंतिम रक्षक माना जाता है।

जब बाकी संस्थाएं बंद हो जाती हैं,

तो सिविल कोर्ट की ओर देखें।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की जिम्मेदारी संविधान की रक्षा करना है।

लेकिन न्याय में विस्तार, लातिन मामलों का बोझ और चाकू मारने की प्रक्रिया आम नागरिकों को थका देती है।

"न्याय में देरी, न्याय से बहस करना है।"

जब जज अंतिम चरण में प्रकट हुए तब तक का खेल ख़त्म हो चुका है,

तो गलत लोग मजबूत और वफादार लोग अस्थिर हो जाते हैं।


अध्याय 24 - सरकारी योजनाएँ और मंजिलें

सरकार की कई आशंकाएं इस प्रकार हैं- गरीबों के लिए, किसानों के लिए, युवाओं के लिए।

कागज़ पर योजनाएँ प्रभावशाली दिखती हैं।

लेकिन जमीनी स्तर पर अक्सर लाभ सही व्यक्ति तक नहीं होता है।

बीच में:

बिचौलिये

फ़्रांज़ी अतिथि

और अन्य

सिस्टम को ठीक करें।

योजना बनाना आसान है,

लेकिन उसे लेबल से लागू करना चुनौती है।


अध्याय 25 - अभिनेता और उनकी राजनीति

समय-समय पर बड़े-बड़े दिग्गज सामने आते हैं।

कुछ दिन तक चर्चा होती है,

फिर धीरे-धीरे मामला शांत हो गया।

दो तरह से सिस्टम को मजबूत बनाते हैं:

यदि आदर्श को सजा न मिले।

यदि जनता कुछ समय बाद भूल जाये।

जब परीक्षण तय नहीं होता,

तो यह संदेश जाता है कि बड़े लोग बच सकते हैं।

यही भावना व्यवस्था में नैतिक ढाल को स्थिर किया गया है।


अध्याय 26 - मूर्ति और शक्ति गठजोड़

व्यापार और राजनीति का संबंध नया नहीं है।

सरकार की नीतियाँ जारी होने से उद्योग जगत प्रभावित हुआ।

समस्या तब शुरू होती है जब नीति सार्वजनिक हित के बजाय निजी हित के लिए बनाई जाती है।

यदि बड़े उद्योग समूह को वित्तीय सहायता और परिवर्तन में नीतियाँ मिलें,

तो आम नागरिक की आवाज जल्दी उठती है।

समर्थन और पुष्टि के बिना यह गठजोड़ लोकतंत्र के संतुलन को बनाए रख सकता है।


अध्याय 27 - पोस्टिंग-पोस्टिंग उद्योग

कई राज्यों में यह आरोप लगाया जा रहा है कि अधिकारियों की पोस्टिंग का असर भी दिखता है और पैसा भी मिलता है।

यदि पद ही "निवेश" बन जाये,

तो उस पद पर अंकित व्यक्ति "वसूली" की समझ से काम लिया जा सकता है।

यह व्यवस्था की परंपरा को खोखला कर देती है।

ईमानदार अधिकारी स्थिरता चाहते हैं।

लेकिन अगर इलेक्ट्रॉनिक हथियार बन जाये,

तो अप्रभावी स्वतन्त्रता तंत्र हो गया है।


अध्याय 28 - स्थानीय पर्यटन का सच

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा स्थानीय स्तर पर होती है—

ग्राम, पंचायत नगर पालिका, नगर निगम।

अनुमान से विकास होता है।

लेकिन अगर पारंपरिक पारंपरिक में प्लाट न हो,

तो ग्राउंड लेवल पर काम होता है।

स्थानीय स्तर पर जनता से सीधे प्रश्न पूछ सकते हैं।

लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई लोग तक सीमित रह गए हैं।


अध्याय 29 - आम नागरिक का नुकसान

जब सिटीजन बार-बार पोस्टऑफिस की रिपोर्ट देखें,

तो वे थक जाते हैं।

वेदवेज़ हैं—

“कुछ बदलने वाला नहीं।”

यह मानसिक हार सिस्टम की सबसे बड़ी चीज़ है।

जब नागरिक आशा छोड़ती है,

तो व्यवस्था स्वतः मजबूत हो जाती है—चाहे वह गलत क्यों न हो।

अध्याय 30 - ईमानदार अपवाद

इसमें बताया गया है कि इसके सभी फायदे क्या हैं।

हर व्यवस्था में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दबाव के बावजूद सही योगदान देते हैं।

टी. एन. शेशन जैसे व्यक्तित्वों ने दिखाया कि एक ईमानदार अधिकारी भी व्यवस्था में बदलाव ला सकता है।

ऐसे उदाहरण साबित करते हैं कि सिस्टम पूरी तरह से ब्लैक आउट नहीं हो सकता।

यदि कोई व्यक्ति परिवर्तन ला सकता है,

तो इससे जुड़े नागरिक कहीं भी अधिक कर सकते हैं।


भाग 3 का समापन विचार

सिस्टम स्वयं मजबूत नहीं होता।

उसे मजबूत बनाते हैं:

अपारदर्शिता

मखाने की कमी

जनता की थकान

और शक्ति का केंद्रीकरण

लेकिन उसी सिस्टम में सुधार भी किया जा सकता है—

यदि नागरिक सक्रिय हों और संस्थाएँ स्वतंत्र रहें।





भाग 4: समाधान और विकल्प

अध्याय 31-40 का विस्तृत आलेख


अध्याय 31 – वैज्ञानिक नागरिक कौन?

वैज्ञानिक नागरिक वह नहीं है जो आवेदन करता है,

बल्कि वह जो सामने आया है, प्रश्न पूछता है और समाधान में भाग लेता है।

वैज्ञानिक नागरिक की पहचान:

वह अपना अधिकार जानता है

अपनी कर्तव्यनिष्ठा भी छोड़ दी गयी है

ग़लत को देखकर चुप नहीं रहना

और सही के लिए आवाज उठाता है

लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत कोई नेता नहीं,

बल्कि वैज्ञानिक नागरिक होता है।

अध्याय 32 - सूचना का अधिकार

के विरुद्ध सबसे शक्तिशाली ताकतों में से एक है

सूचना अधिकार अधिनियम 2005।

इस कानून में आम नागरिक को यह अधिकार दिया गया है कि वह सरकार से पूछे:

पैसा कितना खर्च हुआ?

योजना किसे मिली?

निर्णय कैसे लिया गया?

पहले जो जानकारी केवल ऑनलाइन में बंद रहती थी,

अब वह जनता के सामने आ सकते हैं।

जब जानकारी ओपनगी,

तो अंतिम बैलून।

और जब अंतिम वर्ष,

तो कम होगा।

अध्याय 33 - जन आंदोलन की ताकत

इतिहास बताता है कि जब जनता एकजुट होती है,

तो सबसे मजबूत शक्ति भी झकझोरती है।

अन्ना हाडे के नेतृत्व में अक्रांता विरोधी आंदोलन ने जापान जन आंदोलन की भी व्यवस्था की।

जन आंदोलन:

नागरिकों को एक मंच देता है

अर्थशास्त्र को राष्ट्रीय स्तर पर अपलोड किया गया है

और सत्य को जवाब देने के लिए मजबूर किया जाता है

लेकिन आंदोलन तभी सफल होते हैं,

जब वे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक हिट के लिए लक्ष्य।

अध्याय 34 – संविधान की शपथ

भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव पर नहीं,

बल्कि भारतीय संविधान पर आधारित है।

सांस्कृतिक नागरिकों को अधिकार देता है:

लाभ का अधिकार.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता!

न्याय का अधिकार!

धार्मिक स्वतंत्रता !

लेकिन संविधान सिर्फ सरकार के लिए नहीं है।

यह नागरिकों के लिए भी मार्गदर्शक है।

यदि नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों को स्वीकार करें,

तो लोकतंत्र मजबूत होता है।

अध्याय 35 - शिक्षा में सुधार

समाज का भविष्य पाक कला और पाठ शाला में तैयार होता है।

यदि शिक्षा केवल नौकरी का साधन बन जाये,

तो समाज में एक प्रभावकारी हो जाता है।

शिक्षा में यह शामिल होना चाहिए:

नागरिक जिम्मेदारी।

नैतिक सिद्धांत की समझ।

संविधान और कानून की जानकारी।

सामाजिक।

एक छात्र सेमेस्टर,।

भविष्य का जिम्मेदार नागरिकीकरण है।

अध्याय 36 - डिजिटल प्लॉट

टेक्नोलॉजी से काम करने का शक्तिशाली साधन बन सकता है।

जबाबें सेवाएँ संचालित होती हैं:

रिश्वत के अवसर कम होते हैं।

प्रक्रिया प्रभावित होती है।

और समय की बचत होती है।

उदाहरण :

ऑनलाइन भुगतान

डिजिटल रिकार्ड

- 100/2000

ऑनलाइन शिकायत प्रणाली

डिजिटल शासन से सिस्टम में सहयोगी और सहयोगी दोनों उभर रहे हैं।

अध्याय 37 - युवा नेतृत्व

युवा किसी भी राष्ट्र की ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।

अगर वे राजनीति से दूर रहें,

तो बदलाव की गति चालू होगी।

युवाओं को करना चाहिए:

राजनीति को स्वीकार करें

मतदान करें

स्थानीय उद्योग उद्यमों को सक्रिय करें

और नेतृत्व की ज़िम्मेदारी उठाएँ

जब नई सोच राजनीति में प्रवेश करती है,

तो व्यवस्था में नई ऊर्जा आती है।

अध्याय 38 - स्थानीय स्तर से परिवर्तन

बड़े बदलाव हमेशा छोटे स्तर से शुरू होते हैं।

ग्राम, सभा, विद्यालय प्रबंधन समिति-

ये सब लोकतंत्र के छोटे-छोटे केंद्र हैं।

अगर नागरिक:

ग्राम सभा में भाग लें

स्थानीयनिर्णय प्रश्नावली

और दुकान की मांग करें

तो जड़ो को जड़ो से जोड़ा जा सकता है।

अध्याय 39 - व्यक्तिगत विवरण

सिस्टम की शुरुआत व्यक्ति से होती है।

यदि व्यक्ति:

रिश्वत न दे

सिद्धांत का पालन करें

ख़राब काम में भाग न ले

तो निर्मित की जड़ावती अवैध दिखती है।

लोग बार-बार कहते हैं-

“सिस्टम नियत समय पर है।”

लेकिन सिस्टम लोगों से ही बनता है।

अगर लोग बदलेंगे,

तो सिस्टम भी बदलेगा।

अध्याय 40 – नई सुबह की संभावना

इतिहास में कई बार समाज अंधकार में चला गया,

लेकिन हर बार एक नई सुबह आई।

जब जनता जागती है:

ग़लत नेता हारते हैं

ईमानदार लोग आगे आते हैं

और व्यवस्था सुराजने लगती है

बदलाव एक दिन में नहीं आता।

ये धीरे-धीरे, छोटे-छोटे कदमों से आते हैं।

यदि हर नागरिक:

सच बोले

गलत का विरोध करे

और अपने अधिकार के लिए जाओ

तो लोकतंत्र मजबूत होगा।

नई सुबह का इंतज़ार करना नहीं है।

नई सुबह तब शुरू होती है,

जब नागरिक जागता है।

पूरी किताब का अंतिम संदेश

कैरियर सिर्फ नेताओं की समस्या नहीं है।

यह समाज, व्यवस्था और नागरिकों की सामूहिक स्थिति का परिणाम है।

लेकिन उसी तरह,

समाधान भी सामूहिक ही होगा।

जब जनता जागेगी,

तो व्यवस्था परिवर्तन..




📜पाठकों के नाम लेखक का संदेश

(प्रो. पवन यादव जी के अनुसार)

,

मैं, प्रो. पवन यादव, इस पुस्तक के माध्यम से आप केवल विचार साझा नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक जिम्मेदारी ले रहे हैं।

यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं है।

यह विचार, आत्मनिरीक्षण करने और जगाने के लिए है।

यदि आप इस पुस्तक में केवल "निंदा की आलोचना" के तत्व हैं, तो इसका मतलब यह है कि आप आधा ही अर्थ समझेंगे।

लेकिन अगर आप इसमें एक आईना अध्ययन शामिल करते हैं - जिसमें समाज और स्वयं का दृश्य दिखाई देता है - यह पुस्तक अपना उद्देश्य पूरा करती है।

📌वाक्य समय ध्यान रखने योग्य बातें

1️⃣ खुद से प्रश्नोत्तरी🧑‍⚖️🧑‍🎤🧑‍🎤🕵️🕵️

हर अध्याय के बाद अपने आप से वोट करें:

मैं भी इस समस्या का हिस्सा हूँ?

मैं बदलाव के लिए क्या कर सकता हूँ?

2️⃣ भावना से नहीं, विवेक से पढ़ें💌🧑‍💻🧑‍💻🧑‍💻

इस पुस्तक का उद्देश्य किसी विशेष दल, धर्म या व्यक्ति पर हमला करना नहीं है।

यह सोच और व्यवस्था की समीक्षा है।

कृपया इसे व्यक्तिगत या राजनीतिक समूह से पढ़ें।

यह एक नागरिक के रूप में पढ़ें।

3️⃣ केवल आलोचना नहीं, समाधान देखें🧬🗣️🗣️

अगर आप आर्टिस्ट की डायरी से संबंधित हैं, तो बदलाव की बात नहीं होगी।

परिवर्तन टैग जब होगा तब आप समाधान वाले अध्यायों को अपना भाग चुनें।

4️⃣चर्चा करें, बहस करें💯🌳🌳

इस पुस्तक में आपके दोस्तों, परिवार और समाज के साथ चर्चा का विषय बनाया गया है।

लोकतंत्र संवाद से मजबूत होता है, मौन से नहीं।

5️⃣ अपने आचरण से शुरुआत करें🌸🌸

कृपया यह न इलेक्ट्रॉनिक्स कि बदलाव संसद से शुरू होगा।

बदलाव आपके व्यवहार से शुरू होगा।

आप:,🌱🌱🌱

उधार नहीं

दोष का समर्थन नहीं करेंगे

मतदान करेंगे

और सलाहकार

तो आप इस किताब के पाठक कहलायेंगे।

🎯लेखक की कहानी🪻🪻🪻🍁🍁🍁🍁

मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि यह जरूरी नहीं है कि आप मेरे हर विचार से सहमत हों।

लेकिन मैं यह जरूर चाहता हूं कि आप निर्माण करें, प्रश्न करें और निष्क्रिय न रहें।

यदि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप:

एक बार और अधिक लेख

एक बार से अधिक प्रश्न

और एक बार और अधिक जिम्मेदारियाँ से काम करते हैं।

तो यह लेख सफल माना जाएगा।

✍️अंतिम संदेश🪴🪴🪴🪴🌾

प्रिय पाठक,

देश नेताओं से नहीं, मूल निवास से बनता है।

नेता आते-जाते रहते हैं।

व्यवस्था लागत रहती है।

लेकिन राष्ट्र की आत्मा उसके वैज्ञानिक नागरिक होते हैं।

अगर आप जागेंगे,

तो परिवर्तन व्यवस्था. आपके हाथों में होगा।

आपका



प्रो. पवन यादव✍️✍️✍️✍️🌾🌾🙏🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🌻🌻🌻🌳






















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